पिछले वर्ष तक मेरे विद्यालय के बच्चों की एक आदत मुझे लगातार परेशान करती थी। स्कूल आने से पहले बहुत-से बच्चे अपने माता-पिता से रोज़ 5–10 रुपये चिप्स, कुरकुरे, नमकीन, बिस्किट और इसी तरह की चीज़ें खरीदने के लिए लेते थे। कई बार तो इन चीज़ों को खरीदने के कारण बच्चे विद्यालय देर से भी पहुँचते थे।
एक दिन मैंने सोचा कि बच्चों को केवल यह कह देना कि “पैसे खर्च मत करो” शायद बहुत प्रभावी नहीं होगा। उन्हें बचत का महत्व अनुभव के माध्यम से समझाना होगा।
एक दिन प्रार्थना सभा में मैंने एक बोतल ली और उसमें छोटे-छोटे छेद कर दिए। फिर बच्चों से कहा कि वे नल से उस बोतल में पानी भरकर लाएँ और उसे एक मग में डालें।
बच्चे उत्साह से पानी भरकर लाते, लेकिन जब तक वे मग तक पहुँचते, बोतल के अधिकांश छेदों से पानी निकल चुका होता। मग में बस कुछ बूंदें ही बचतीं। बच्चों ने कई बार यह प्रक्रिया दोहराई। धीरे-धीरे वही कुछ बूंदें मिलकर लगभग एक-चौथाई मग पानी बन गईं।
यहीं से मैंने उनसे बचत की बात शुरू की।
मैंने कहा,
“देखो, पानी की ये बूंदें बिल्कुल उन छोटे-छोटे पैसों की तरह हैं जिन्हें हम अक्सर बहुत मामूली समझकर खर्च कर देते हैं। अगर रोज़ के 5–10 रुपये खर्च करने के बजाय उन्हें गुल्लक में डाल दिया जाए, तो कुछ समय बाद यही छोटी-छोटी रकम एक बड़ी राशि बन सकती है।”
मैंने बच्चों को गुल्लक बनाने के लिए प्रेरित किया। उनसे कहा कि वे रोज़ मिलने वाले उन पैसों को, जिन्हें वे अनावश्यक चीज़ों पर खर्च कर देते हैं, अपनी गुल्लक में जमा करें। मैंने उन्हें अपने जीवन का एक छोटा-सा उदाहरण भी बताया कि जब मेरी माँ मुझे पैसे देती हैं, तो मैं उन्हें अपने पर्स में रख देती हूँ और कोशिश करती हूँ कि उन्हें हाथ भी नहीं लगाऊँ । इसी तरह धीरे-धीरे मेरे पास भी एक अच्छी-खासी राशि जमा हो गई है।
उस समय बच्चों ने बड़े ध्यान से मेरी बात सुनी।
फिर मैंने कुछ दिनों तक उनसे पूछा भी कि किसने गुल्लक बनाई है, किसने पैसे जमा किए हैं। उसके बाद रोज़मर्रा की व्यस्तताओं में यह बात कहीं पीछे छूट गई। सच कहूँ तो मुझे लगा कि शायद बच्चे भी इसे भूल गए होंगे।
लेकिन बच्चे भूले नहीं थे।
एक साल बाद मिली उस सीख की सबसे खूबसूरत वापसी
कल मेरी कक्षा (कक्षा -४) के कुछ बच्चों की कॉपियाँ भर गई थीं। मैंने उनसे नई कॉपियाँ खरीदने के लिए कहा। आज मेरी कक्षा की एक बच्ची, शिवांगी (परिवर्तित नाम) मेरे पास आई और बहुत गर्व से बोली,
“मैम जी, जानती हैं, ये कॉपी हमने अपने पैसों से ली है।”
मैंने आश्चर्य से पूछा,
“मतलब?”
उसने बताया कि पिछले दिन उसके पापा की बिक्री अच्छी नहीं हुई थी और उनके पास उस समय पैसे नहीं थे। इसलिए उसने अपनी गुल्लक से पैसे निकाले और अपनी कॉपियाँ खरीद लीं।
मैं कुछ क्षण के लिए उसे देखती रह गई।
जिस गुल्लक को मैंने कभी एक छोटी-सी कक्षा गतिविधि के रूप में शुरू करवाया था, वह आज उसके लिए ज़रूरत के समय सहारा बन चुकी थी।
इसके बाद धीरे-धीरे मेरी कक्षा के कई बच्चे अपनी-अपनी गुल्लक की बातें बताने लगे। किसी की गुल्लक में ₹325 थे, किसी में ₹2,150, किसी में ₹150, किसी में ₹1,050, किसी में ₹100, किसी में ₹40, किसी में ₹550 और किसी में ₹650।
ये सिर्फ आंकड़े नहीं थे।
हर राशि के पीछे एक बच्चे की छोटी-सी बचत, उसका संयम और अपनी जरूरतों को समझने की उसकी क्षमता थी।
कुछ बच्चों ने यह भी बताया कि जब घर में कभी पैसों की जरूरत पड़ती है तो वे अपनी बचत में से पैसे निकालकर घर के लिए सब्ज़ी, तेल, मसाले या दूसरी आवश्यक चीज़ें लाने में अपनी माँ की मदद करते हैं।
उनकी बातें सुनते-सुनते मेरा मन भर आया।
उनमें से कुछ बातें इतनी निजी थीं कि उन्हें यहाँ साझा करना मैं उचित नहीं समझती। लेकिन उन बातों ने मुझे भीतर तक छुआ। शायद इसलिए भी कि वहाँ सिर्फ बचत की आदत नहीं थी, बल्कि उसके साथ जिम्मेदारी, आत्मनिर्भरता और परिवार के प्रति संवेदनशीलता भी दिखाई दे रही थी।
और सबसे अधिक भावुक करने वाली बात थी- इन बच्चों का मुझ पर विश्वास।
उन्होंने अपनी गुल्लक के बारे में मुझे बताया। अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियाँ मेरे साथ बाँटीं। शायद उनके लिए यह सामान्य बातचीत रही होगी, लेकिन मेरे लिए यह बहुत बड़ा भावनात्मक क्षण था।
मैं सोचती रही कि हम शिक्षक कक्षा में कितनी बातें कहते हैं। कुछ बातें बच्चे उसी क्षण भूल जाते हैं, कुछ कुछ दिनों बाद। लेकिन कभी-कभी कोई छोटी-सी बात उनके मन में कहीं चुपचाप जगह बना लेती है और फिर सही समय आने पर हमारे सामने उसके परिणाम के रूप में लौटती है।
उस दिन मैंने बच्चों को सिर्फ बचत सिखाने की कोशिश की थी।
लेकिन आज उन्होंने मुझे उससे कहीं बड़ी बात सिखाई-
बचत केवल पैसे जमा करना नहीं है।
बचत हमें धैर्य सिखाती है, जिम्मेदारी सिखाती है और सबसे बढ़कर- ज़रूरत के समय अपने पैरों पर खड़े होना सिखाती है।
आज मुझे अपनी उस छोटी-सी बोतल और उसमें से गिरती पानी की उन बूंदों की याद आ रही है।
तब मग में कुछ बूंदें जमा हुई थीं।
आज महसूस हुआ कि शायद उसी दिन से बच्चों के भीतर भी कुछ जमा होना शुरू हो गया था- एक विचार, एक आदत और आत्मनिर्भर बनने का विश्वास।
शिक्षा का सबसे सुंदर रूप शायद यही है- जब हमारी कही हुई बात, वर्षों बाद बच्चों के जीवन में व्यवहार बनकर लौटती है।
और आज मेरी कक्षा की वे छोटी-छोटी गुल्लकें मुझे सिर्फ पैसे से भरी हुई नहीं दिख रही हैं।
मुझे उनमें भविष्य के लिए तैयार होते हुए छोटे-छोटे आत्मनिर्भर व्यक्तित्व दिखाई दे रहे हैं।