पुरस्कार की तालियों से आगे—शिक्षक के सम्मान की असली परीक्षा
जिस शिक्षक को सरकार उत्कृष्टता का प्रमाण देती है, उसके जीवन और कार्य में सम्मान कब दिखाई देगा?
शिक्षक दिवस पर जब किसी शिक्षक का नाम पुरस्कार के लिए पुकारा जाता है, तो मंच तक केवल एक व्यक्ति नहीं पहुँचता। उसके साथ वर्षों की मेहनत, विद्यार्थियों की उपलब्धियाँ, परिवार का त्याग, विद्यालय की चुनौतियाँ और उसके भीतर शिक्षा के प्रति पलता विश्वास भी मंच तक पहुँचता है।
प्रशस्ति-पत्र हाथ में आते ही आँखों में चमक आ जाती है। तालियों की गड़गड़ाहट मन को छूती है। वर्षों से चुपचाप किए गए कार्य की सार्वजनिक स्वीकृति किसी भी शिक्षक के लिए अत्यंत प्रफुल्लित करने वाला क्षण है। वह सोचता है—मेहनत पहचानी गई, मेरी भूमिका को स्वीकार किया गया।
निस्संदेह, शिक्षक को पुरस्कृत किया जाना गौरव की बात है।
लेकिन असली प्रश्न पुरस्कार मिलने के बाद शुरू होता है—
क्या शिक्षक का सम्मान समारोह समाप्त होते ही समाप्त हो जाता है?
*एक दिन का सम्मान या जीवन भर की गरिमा?*
अक्सर शिक्षक सम्मान समारोह एक दिवसीय आयोजन बनकर रह जाते हैं। मंच सजता है, माला पहनाई जाती है, प्रशस्ति-पत्र दिया जाता है, तस्वीरें खिंचती हैं, कुछ प्रेरक शब्द कहे जाते हैं और समारोह समाप्त हो जाता है।
अगले दिन शिक्षक फिर उसी व्यवस्था में लौट आता है—उसी कार्यभार, उन्हीं प्रशासनिक अपेक्षाओं और कई बार उन्हीं गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों के बीच।
यहीं पुरस्कार और सम्मान के बीच का अंतर दिखाई देता है।
पुरस्कार एक क्षण हो सकता है, लेकिन सम्मान एक सतत व्यवहार है।
यदि किसी शिक्षक को उत्कृष्ट शिक्षण के लिए पुरस्कृत किया गया है, तो पुरस्कार के बाद व्यवस्था का दायित्व बनता है कि उसके शिक्षण को और बेहतर बनाने के लिए उसे समय, संसाधन, स्वतंत्रता और सहयोग मिले।
*पुरस्कृत शिक्षक भी एक परिवार का हिस्सा है*
हम अक्सर शिक्षक को केवल ‘शिक्षक’ के रूप में देखते हैं। भूल जाते हैं कि विद्यालय के बाहर वह भी किसी का पिता, माता, पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी या परिवार का जिम्मेदार सदस्य है।
उसके घर में भी बच्चे हैं जिन्हें उसका समय चाहिए। उसके माता-पिता भी उसकी उपस्थिति चाहते हैं। उसके अपने स्वास्थ्य, निजी आकांक्षाएँ और सामाजिक दायित्व हैं।
लेकिन जब लगातार अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ, प्रशासनिक कार्य, कागजी प्रक्रियाएँ और गैर-शैक्षणिक दायित्व उसके शिक्षण समय और निजी समय को घेर लेते हैं, तो उसका व्यक्तिगत जीवन प्रभावित होता है।
वह बच्चों को समय का महत्व समझाता है, लेकिन स्वयं अपने परिवार को पर्याप्त समय नहीं दे पाता।
वह विद्यार्थियों को तनाव से बचने की सलाह देता है, लेकिन कई बार स्वयं मानसिक दबाव लेकर घर लौटता है।
यह विडंबना हमें सोचने के लिए विवश करती है।
*क्या शिक्षा की गुणवत्ता की कीमत शिक्षक के पारिवारिक और मानसिक सुकून से चुकाई जानी चाहिए?*
व्यावसायिक जीवन में भी अवरोध
शिक्षक का मूल काम पढ़ाना है—बच्चे को समझना, उसकी जिज्ञासा जगाना, उसकी कमजोरी पहचानना और उसके भीतर आत्मविश्वास पैदा करना।
लेकिन यदि उसका अधिकांश समय ऐसे कार्यों में चला जाए जिनका प्रत्यक्ष संबंध शिक्षण से नहीं है, तो शिक्षा प्रभावित होना स्वाभाविक है।
पुरस्कृत शिक्षक से अपेक्षा होनी चाहिए कि वह अपने अनुभव और नवाचार से दूसरे शिक्षकों और विद्यार्थियों को प्रेरित करे। मगर इसके लिए उसे केवल पुरस्कार नहीं, काम करने का अवसर भी चाहिए।
उसकी विशेषज्ञता को सुना जाए। उसके सुझावों को महत्व मिले। उसके नवाचारों को आगे बढ़ाने का मंच मिले। उसकी व्यावसायिक गरिमा बनी रहे।
जिस शिक्षक को उत्कृष्ट कहा गया है, उसकी उत्कृष्टता का उपयोग व्यवस्था करे—केवल प्रमाण-पत्र देकर उसे अलमारी में बंद न कर दे।
*सामाजिक सम्मान का भी अपना सच है*
समाज शिक्षक से बहुत अपेक्षा रखता है। वह चाहता है कि शिक्षक बच्चे को ज्ञान दे, संस्कार दे, अनुशासन दे और उसे सफल बनाए।
जीयह अपेक्षा स्वाभाविक है।
लेकिन शिक्षक भी समाज से कुछ चाहता है—विश्वास।
जब हर शैक्षणिक समस्या का उत्तरदायित्व केवल शिक्षक पर डाल दिया जाता है, जब अभिभावक और समुदाय सहयोगी बनने के बजाय केवल परिणाम पूछने वाले बन जाते हैं, तब शिक्षक पर दबाव बढ़ता है।
शिक्षा केवल शिक्षक और बच्चे के बीच का संबंध नहीं है। इसमें परिवार, समाज और सरकार—तीनों की साझेदारी आवश्यक है।
सरकार से शिकायत नहीं, संवेदनशील अपेक्षा
*यह आलेख सरकार की आलोचना के लिए नहीं, बल्कि उससे एक संवेदनशील अपेक्षा रखने के लिए है।*
सरकार यदि शिक्षक को राष्ट्र-निर्माता मानती है, तो उसकी नीतियों और व्यवहार में भी यह विश्वास दिखाई देना चाहिए।
शिक्षकों के स्थानांतरण और पदस्थापन में मानवीय दृष्टिकोण हो। प्रशासनिक निर्णयों में पारिवारिक परिस्थितियों को उचित महत्व मिले। गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ कम हो। विद्यालयों में पर्याप्त संसाधन हों। शिक्षक को अपनी बात रखने का अवसर मिले।
और सबसे महत्वपूर्ण—शिक्षक को केवल आदेश प्राप्त करने वाला कर्मचारी नहीं, बल्कि शिक्षा का विशेषज्ञ माना जाए।
*निदान*
पुरस्कार से आगे है
*शिक्षक सम्मान को सार्थक बनाने के लिए कुछ बातें सुनिश्चित करनी होंगी।*
शिक्षक का अधिकतम समय कक्षा और विद्यार्थियों के साथ हो। गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिए वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की जाए। पुरस्कृत शिक्षकों के अनुभव और नवाचारों का उपयोग शिक्षक प्रशिक्षण में किया जाए। उनके लिए संवाद और सुझाव की संस्थागत व्यवस्था हो।
साथ ही, समाज को भी शिक्षक के साथ खड़ा होना होगा। अभिभावक उसे केवल बच्चे के परिणाम का जिम्मेदार न मानें, बल्कि उसके सहयोगी बनें।
क्योंकि अच्छा शिक्षक अकेला शिक्षा की पूरी व्यवस्था को नहीं बदल सकता; उसे एक संवेदनशील व्यवस्था और सहयोगी समाज की आवश्यकता होती है।
*सबसे बड़ा पुरस्कार—शिष्य की स्मृति*
फिर भी शिक्षक के जीवन में एक ऐसा पुरस्कार है, जिसकी तुलना किसी सरकारी सम्मान से नहीं की जा सकती।
वर्षों बाद कोई विद्यार्थी अचानक सामने आकर कहता है—
“गुरुजी, आपने मुझे उस समय संभाला था, जब मुझे स्वयं पर विश्वास नहीं था।”
उस एक वाक्य में शिक्षक को अपनी पूरी जिंदगी की मेहनत का प्रतिफल दिखाई देता है।
किसी पूर्व विद्यार्थी का चरण स्पर्श करना, वर्षों बाद फोन करके हाल पूछना, सफलता मिलने पर गुरु को याद करना—ये वे सम्मान हैं जिन्हें कोई सरकार जारी नहीं करती, लेकिन यही शिक्षक की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं।
*अब शिक्षक दिवस का अर्थ बदलने की जरूरत है*
हमें शिक्षक दिवस को केवल समारोह का दिन नहीं, बल्कि शिक्षक के प्रति अपने व्यवहार की समीक्षा का दिन बनाना होगा।
हमें यह पूछना होगा—
जिस शिक्षक को हमने पुरस्कृत किया, क्या हमने उसे पर्याप्त समय दिया?
क्या हमने उसके परिवार की परिस्थितियों को समझा?
क्या हमने उसकी व्यावसायिक गरिमा की रक्षा की?
क्या हमने उसकी बात सुनी?
क्या हमने उसके ऊपर अनावश्यक दायित्वों का बोझ कम किया?
और क्या समाज ने उसे केवल परिणाम देने वाली मशीन के बजाय संवेदनशील मनुष्य के रूप में देखा?
इन प्रश्नों के उत्तर ही शिक्षक सम्मान की वास्तविक कसौटी हैं।
शिक्षक को मंच पर सम्मानित करना अच्छी परंपरा है, लेकिन उसके बाद उसके जीवन को सम्मानजनक बनाना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।
पुरस्कार की तालियाँ कुछ क्षणों के लिए शिक्षक को प्रफुल्लित करती हैं। प्रशस्ति-पत्र उसकी उपलब्धि का प्रमाण बनता है। लेकिन शिक्षक को जीवन भर जो चाहिए, वह है—विश्वास, सहयोग, सम्मान और अपनी भूमिका को गरिमा के साथ निभाने का अवसर।
क्योंकि शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाता।
वह पीढ़ियाँ तैयार करता है।
और जो समाज अपने शिक्षकों को सम्मान के साथ जीने और काम करने का अवसर देता है, वास्तव में वही अपने भविष्य को सम्मान देता है।
शिक्षक का सम्मान एक दिवस का आयोजन नहीं होना चाहिए;
वह सरकार की नीति, समाज के व्यवहार और शिष्य की स्मृति—तीनों में दिखाई देना चाहिए।
यही शिक्षक दिवस की सच्ची सार्थकता होगी।
कुंदन झा ( राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित सेवानिवृत शिक्षक)