एक शिक्षक की डायरी से...
13 अगस्त 2026 - नई दिल्ली - कर्तव्य भवन-2
एक ऐसा दिन, जिसे शायद मैं लंबे समय तक याद रखूंगा।
मैं वहां केवल एक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षक के रूप में नहीं गया था। मैं अपने साथ उन हजारों कक्षाओं की आवाज़ लेकर गया था, जहां शिक्षक सीमित संसाधनों के बीच बच्चों को पढ़ाने की कोशिश करते हैं। उन गांवों की कक्षाएं, जहां तकनीक अभी भी सुविधा नहीं, बल्कि बदलाव की उम्मीद है।
दीक्षा 3.0 के प्रस्ताव पर आयोजित इस उच्चस्तरीय बैठक में शामिल होने का निमंत्रण मेरे लिए केवल एक औपचारिक निमंत्रण नहीं था। यह मेरे लिए एक जिम्मेदारी थी।
बैठक की अध्यक्षता श्री धीरज साहू, भारतीय प्रशासनिक सेवा, अपर सचिव, स्कूली शिक्षा एवं डिजिटल शिक्षा, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने की। श्री हरि कुमार जानकीरामन, निदेशक (डिजिटल शिक्षा), श्री अमरेन्द्र प्रसाद बेहरा, संयुक्त निदेशक, NCERT सहित डिजिटल इंडिया, NIC, NIOS, KVS, एनवीएस आदि वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। भारत बोधन कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्कृष्टता केंद्र, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास की टीम ने दीक्षा 3.0 का प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
और फिर आया वह क्षण, जो मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण था।
मुझे दो अन्य राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों, उत्तराखंड से श्री रमेश प्रसाद बडोनी और आंध्रप्रदेश से श्रीनिवास पोकरी, के साथ अपनी बात रखने का अवसर मिला।
मैंने सोचा...
अगर हम शिक्षकों के लिए तकनीक बना रहे हैं, तो क्या हमने कभी शिक्षक से पूछा है कि उसे वास्तव में चाहिए क्या?
एक शिक्षक के रूप में मैं पिछले कई वर्षों से कक्षा में तकनीक का उपयोग करता आया हूं। एक तकनीक-प्रेमी शिक्षक के रूप में मैंने स्वयं डिजिटल सामग्री और अनेक शैक्षिक अनुप्रयोग विकसित किए हैं। इसलिए मैं तकनीक को केवल बाहर से देखने वाला व्यक्ति नहीं हूं। मैंने उसे बनाया भी है, इस्तेमाल भी किया है और उसकी सीमाओं को कक्षा में महसूस भी किया है।
मेरी समझ में एक बात बहुत स्पष्ट है:
शिक्षा में सबसे अच्छी तकनीक वह नहीं है जिसमें सबसे अधिक सुविधाएं हों। सबसे अच्छी तकनीक वह है जो शिक्षक का काम आसान करे और बच्चे का सीखना बेहतर बनाए।
हम अक्सर तकनीक की भाषा में बात करते हैं।
AI - कृत्रिम बुद्धिमत्ता, LLM - बड़े भाषा मॉडल, Personalised Learning - व्यक्तिगत अधिगम, Data - आंकड़े/सूचनाएं, Automation - स्वचालन, Adaptive Teaching - अनुकूली शिक्षण।
लेकिन एक शिक्षक की भाषा थोड़ी अलग होती है।
वह पूछता है:
- क्या मेरे बच्चे इसे समझ पाएंगे?
- क्या मैं इसे आसानी से कक्षा में चला पाऊंगा?
- क्या यह मेरे समय की बचत करेगा?
- क्या यह मेरे बच्चों की रुचि बढ़ाएगा?
- क्या यह कमजोर बच्चे की मदद करेगा?
- क्या यह ग्रामीण विद्यालय के सीमित संसाधनों में भी काम करेगा?
शिक्षक के रूप में मुझे बड़े-बड़े आँकड़े नहीं चाहिए यथा इतने करोड़ इनस्टॉल हो गए, इतने लाख ई-कंटेंट हैं, इतने लाख सेशन ही गये ।
मुझे चाहिए:
- मेरे कौन से बच्चे किन टॉपिक्स में कठिनाई महसूस कर रहे हैं?
- क्या इस प्रोजेक्ट की मदद से मैं अलग-अलग बच्चों के लिए अलग-अलग शिक्षण सामग्री मुहैया करा पा रहा हूँ?
- क्या यह प्रोजेक्ट मुझे बच्चों के साथ अधिक रहने का समय दे रहा है या मुझसे समय छीन रहा है?
- क्या मैं तुरंत ही लेसन प्लान बना पा रहा हूँ, वर्कशीट बना पा रहा हूँ, असेसमेंट कर पा रहा हूँ?
- क्या डैशबोर्ड मुझे सीखने से संबंधित सार्थक डेटा उपलब्ध करा रहा है?
- क्या शैक्षिक को-पायलट सोक्रेटिक लर्निंग एप्रोच फॉलो करा रहा है या सिर्फ़ तथ्यात्मक जवाब देने वाला बोरिंग एआई बॉट है जिससे 4 दिन में ही बच्चे बोर हो गए हैं?
यहीं पर प्रौद्योगिकी और शिक्षाशास्त्र का मिलन होता है।
मेरा मानना है कि दीक्षा 3.0 केवल दीक्षा का अगला संस्करण नहीं होना चाहिए। इसे भारत की विविध कक्षाओं को समझने वाला एक ऐसा डिजिटल साथी बनना चाहिए, जो शिक्षक के साथ खड़ा हो। शिक्षक को केवल सामग्री देने के बजाय सामग्री बनाने, अनुकूलित करने और साझा करने की शक्ति मिले।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल उत्तर देने वाली मशीन न हो, बल्कि शिक्षक की योजना बनाने, सामग्री तैयार करने, मूल्यांकन करने और विद्यार्थियों की सीखने की जरूरतों को समझने में सहायक बने।
और सबसे महत्वपूर्ण...
शिक्षक को तकनीक का उपभोक्ता नहीं, तकनीक के निर्माण में सहभागी बनाया जाए।
मुझे इस बैठक की यही बात सबसे अच्छी लगी कि नीति-निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच कक्षा में काम करने वाले शिक्षकों की आवाज़ को भी स्थान मिला। आधिकारिक आमंत्रण में भी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों के अनुभवों और सुझावों को दीक्षा 3.0 की परिकल्पना, रूपरेखा और क्रियान्वयन के लिए महत्वपूर्ण बताया गया था।
बैठक से लौटते समय मन में एक संतोष था।
क्योंकि आज एक शिक्षक केवल यह नहीं कह रहा था कि "हमें तकनीक चाहिए।"
वह यह कहने की स्थिति में था कि:
"हमें कैसी तकनीक चाहिए, क्यों चाहिए और वह हमारी कक्षा को कैसे बेहतर बनाएगी।"
शायद यही किसी भी बड़े शैक्षिक परिवर्तन की शुरुआत है।
नीतियाँ ऊपर से बन सकती हैं। तकनीक विशेषज्ञ बना सकते हैं। लेकिन शिक्षा की वास्तविकता कक्षा में दिखाई देती है। और कक्षा की उस वास्तविकता को समझने के लिए शिक्षक की आवाज़ सुनना जरूरी है।
आज की डायरी में मैंने एक पंक्ति लिखी है:
"भविष्य की शिक्षा केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता से नहीं बनेगी। वह शिक्षक की बुद्धिमत्ता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सही संयोजन से बनेगी।"
दीक्षा 3.0 के इस सफर का हिस्सा बनना मेरे लिए सम्मान भी है और जिम्मेदारी भी। मैं भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय, एनसीईआरटी और शिक्षा विभाग को विनम्रता पूर्वक धन्यवाद प्रेषित करता हूँ । उम्मीद है कि आने वाला दीक्षा केवल एक डिजिटल मंच नहीं होगा, बल्कि भारत के शिक्षक और विद्यार्थी के लिए एक सच्चा डिजिटल साथी बनेगा।